स्वर गंगा की इस तट पर..
सूर साधकोंका आज मेला है,
राग यमन हो, या हो बिहाग..
हर गहराई मै आपको पाया है !!
मेरी जीवन की लघुता को
जड से आपने मिटाया है !
तेजोमय हो जीवन मेरा
विश्वास आपने जगाया है !
कैसे "हरी" का अंश बने तुम ?
फिर स्वरो का वंश बने तुम,?
बंदिश लेकर "रुपक" मन की
गोकुल के जो कृष्ण बने तुम
मन मे भक्ती भाव लेकर..
और स्वरों का साज चढाकर,
हम वंदन करने आये है ,
आशिष पाकर आपका...
हम सारंग बजाने आए है!
वंदन करने आये है हम
नतमस्तक होने आये है..
गुरु आपकी चरनों पर
पुष्प चढाने आये है..!!
- स्वर सचेतन
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